
क्या आप भी जीवन के सबसे बड़े प्रश्नों—मैं कौन हूँ? मेरा कर्तव्य क्या है? मुझे दुःख क्यों होता है?—के उत्तर खोज रहे हैं? क्या आप भी भय, चिंता और भ्रम के भंवर में फँसे महसूस कर रहे हैं? यदि हाँ, तो भगवद गीता का दूसरा अध्याय, जिसे 'सांख्य योग' के नाम से जाना जाता है, आपके लिए एक प्रकाशस्तंभ है। यह अध्याय केवल एक धार्मिक ग्रंथ का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक शाश्वत दर्शन है, एक मनोवैज्ञानिक मार्गदर्शिका है जो 2026 में भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी हजारों वर्ष पहले थी।
इस गहन लेख में, हम भगवद गीता अध्याय 2 के गूढ़ रहस्यों को सरल व्याख्या के साथ समझेंगे, जिसमें आत्मा की अमरता, श्रीकृष्ण के उपदेश अर्जुन को, कर्मयोग का रहस्य, निष्काम कर्म क्या है, आत्मा और शरीर का अंतर, स्थितप्रज्ञ कौन है, मन पर नियंत्रण गीता के अनुसार कैसे करें, कर्म फल त्याग का अर्थ, जीवन का उद्देश्य गीता में क्या है, डर और भ्रम से मुक्ति कैसे पाएं, गीता से जीवन मार्गदर्शन कैसे प्राप्त करें, गीता अध्याय 2 मनोविज्ञान और तनाव से मुक्ति गीता के सिद्धांतों से कैसे संभव है, तथा इसके श्लोक अर्थ सहित विस्तार से जानेंगे। यह आध्यात्मिक ज्ञान आपके जीवन को एक नई दिशा प्रदान करेगा।
आत्मा अमर है, शरीर नश्वर: अध्याय 2 का मूल सिद्धांत आत्मा की अविनाशी प्रकृति और शरीर की अस्थायीता है, जो मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाता है।
कर्म का सिद्धांत और निष्काम कर्म: श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने की अनिवार्यता और फल की आसक्ति त्यागे बिना कर्म करने का मार्ग सिखाते हैं, जो सच्चे कर्मयोग का रहस्य है।
समत्व बुद्धि और स्थितप्रज्ञ: जीवन के सुख-दुःख, लाभ-हानि में समभाव रखना और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना 'स्थितप्रज्ञ' की पहचान है, जो मानसिक शांति का आधार है।
डर और भ्रम से मुक्ति: आत्मज्ञान के माध्यम से अर्जुन का भय दूर होता है, यह दर्शाता है कि अज्ञान ही समस्त दुखों का मूल कारण है और ज्ञान ही सच्ची मुक्ति है।
जीवन का उद्देश्य और गीता से मार्गदर्शन: यह अध्याय बताता है कि हमारा वास्तविक उद्देश्य आत्मज्ञान प्राप्त करना, कर्तव्यनिष्ठा से कर्म करना और मन पर नियंत्रण पाना है, जो हमें शाश्वत सुख की ओर ले जाता है।
कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि में, अर्जुन अपने सामने खड़े पूज्य गुरुजनों, रिश्तेदारों और मित्रों को देखकर मोहग्रस्त हो गए थे। उन्होंने युद्ध लड़ने से मना कर दिया, उनका गांडीव हाथ से छूट गया और वे गहरे विषाद में डूब गए। यह सिर्फ एक योद्धा की हार नहीं थी, बल्कि मानव मन के सबसे बड़े संकट का प्रतीक था – कर्तव्य और मोह के बीच का संघर्ष। इस गहन संकट की घड़ी में, अर्जुन ने अपनी सारी बुद्धि और शक्ति खो दी। वे भगवान श्रीकृष्ण की शरण में गए और उनसे कहा, "मैं आपके शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ। जो मेरे लिए श्रेयस्कर हो, वह निश्चित रूप से कहिए।" (भगवद गीता 2.7)
यह 'शरणागति भाव' ही भगवद गीता के ज्ञान की नींव है। जब हमारा अहंकार टूटता है, जब हम अपनी सीमाओं को स्वीकार करते हैं और किसी उच्चतर शक्ति या ज्ञान के प्रति पूर्ण समर्पण करते हैं, तभी सच्चे ज्ञान के द्वार खुलते हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के इस समर्पण को स्वीकार किया और अपने सबसे महत्वपूर्ण उपदेशों की शुरुआत की।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मोह और विषाद को देखकर गहरी करुणा महसूस की, लेकिन उन्होंने सीधे ही अर्जुन की कायरता और अज्ञान की स्पष्ट आलोचना भी की। उन्होंने कहा, "हे अर्जुन! तुम ऐसे समय में यह मोह क्यों कर रहे हो? यह मोह न तो आर्य पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है, न कीर्ति को बढ़ाने वाला है, और न ही यह तुम्हारे लिए उचित है। नपुंसकता को प्राप्त मत हो, क्योंकि यह तुम्हारे लिए योग्य नहीं है।" (भगवद गीता 2.2-2.3 का सार)
यह आलोचना अर्जुन को जगाने के लिए आवश्यक थी। यह हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक ज्ञान तभी काम करता है जब हम अपनी कमजोरियों का सामना करें, उन्हें स्वीकार करें और उनसे ऊपर उठने की इच्छा रखें। श्रीकृष्ण जानते थे कि अर्जुन का दुःख वास्तविक नहीं, बल्कि अज्ञान जनित है। यह अज्ञान ही डर और भ्रम से मुक्ति में सबसे बड़ी बाधा है।
भगवद गीता अध्याय 2 का सबसे मौलिक और महत्वपूर्ण उपदेश आत्मा की अमरता का है। श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि वे जिसके लिए शोक कर रहे हैं, वह शरीर है, जो नश्वर है। लेकिन इसके भीतर निवास करने वाली आत्मा नित्य, अमर और अविनाशी है।
श्लोक 2.16: "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥"
अर्थ: असत् (जो नहीं है) का अस्तित्व नहीं होता और सत् (जो है) का अभाव नहीं होता। इन दोनों का तत्वज्ञानियों द्वारा देखा गया है। (यानी, शरीर असत् है, आत्मा सत् है।)
श्लोक 2.20: "न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥"
अर्थ: यह आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है; न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाली है (अर्थात् यह नित्य है), अजन्मा, शाश्वत, पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मरती।
यह समझना ही आत्मा और शरीर का अंतर है। शरीर तो एक वस्त्र की तरह है जिसे आत्मा बदलती रहती है। जैसे हम पुराने वस्त्र त्याग कर नए वस्त्र पहनते हैं, वैसे ही आत्मा एक पुराना शरीर त्याग कर नया शरीर धारण करती है। यह उपदेश मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाता है और हमें जीवन के उद्देश्य गीता के मूल की ओर ले जाता है।
जन्म और मृत्यु प्रकृति का अटल नियम है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इस नियम पर शोक करना व्यर्थ है।
श्लोक 2.27: "जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥"
अर्थ: क्योंकि जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मरा है, उसका जन्म निश्चित है। अतः जो अटल है, उसके लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
यह श्लोक हमें सिखाता है कि शोक केवल उन चीजों पर करना चाहिए जो अनित्य हैं और जिनसे हम मोह करते हैं। आत्मा अमर है, इसलिए आत्मा के लिए शोक नहीं करना चाहिए। शरीर नश्वर है, उसका विनाश निश्चित है, इसलिए उसके लिए भी शोक नहीं करना चाहिए। यह दर्शन हमें सिखाता है कि हमें किस पर ध्यान देना चाहिए—नश्वर शरीर पर या शाश्वत आत्मा पर। यह तनाव से मुक्ति गीता के मार्ग की पहली सीढ़ी है। अधिक आध्यात्मिक ज्ञान के लिए, आप सनातन धर्म पर एक लेख पढ़ सकते हैं।
श्रीकृष्ण अर्जुन को उनके क्षत्रिय धर्म की याद दिलाते हैं। उनका कर्तव्य था युद्ध करना और अधर्म का नाश करना। अपने कर्तव्य से विमुख होना, उनके लिए पाप था।
श्लोक 2.31: "स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥"
अर्थ: अपने धर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिए; क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर और कोई श्रेय (कल्याण का मार्ग) नहीं है।
यह केवल युद्ध के संदर्भ में नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के लिए है। हमें अपने 'स्वधर्म' (अपना निर्धारित कर्तव्य) का पालन करना चाहिए। चाहे हम विद्यार्थी हों, पेशेवर हों, या परिवार के सदस्य, हमारा कर्तव्य ही हमारा धर्म है। अपने कर्तव्य का पालन करना ही भगवद गीता से जीवन मार्गदर्शन का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
अध्याय 2 में कर्म का सिद्धांत विस्तार से समझाया गया है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि कोई भी क्षण ऐसा नहीं जब कोई व्यक्ति कर्म न कर रहा हो। कर्म करना प्रकृति का नियम है।
श्लोक 2.47: "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"
अर्थ: तुम्हारा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। तुम कर्मफलों के हेतु मत बनो और न ही तुम्हारी अकर्मण्यता में आसक्ति हो।
यह श्लोक कर्मयोग का रहस्य है। यह बताता है कि हमें कर्म करना चाहिए, लेकिन कर्म फल त्याग का अर्थ यह है कि हमें उसके परिणाम की चिंता नहीं करनी चाहिए। यदि हम फल की चिंता करते हैं, तो वह चिंता हमारे मन पर नियंत्रण गीता के सिद्धांतों के विपरीत होती है और हमें परेशान करती है। यह शिक्षा आधुनिक जीवन में अध्याय 2 की प्रासंगिकता को दर्शाती है, जहाँ परिणामोन्मुखी दबाव आम बात है।
यदि आप अपनी कुंडली के माध्यम से अपने करियर की संभावनाओं को समझना चाहते हैं, तो करियर ग्रोथ के लिए ज्योतिषीय सुझाव पर एक उपयोगी लेख है।
निष्काम कर्म क्या है? यह फल की इच्छा के बिना कर्म करना है। इसका उद्देश्य यह है कि जब हम फल की इच्छा से मुक्त होकर कर्म करते हैं, तो हम उसके अच्छे या बुरे परिणाम से प्रभावित नहीं होते। यह हमें मानसिक शांति देता है और हमें जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करता है।
श्लोक 2.48: "योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥"
अर्थ: हे धनंजय! आसक्ति को त्यागकर, सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म करो। समत्व ही योग कहलाता है।
निष्काम कर्म हमें अपनी क्षमता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता देता है, क्योंकि हम परिणाम के दबाव से मुक्त होते हैं। यह गीता अध्याय 2 सरल व्याख्या का सार है।
मनोवैज्ञानिक रूप से, फलासक्ति हमें लगातार भविष्य की चिंता में रखती है। यदि हम कर्म के फल से बहुत अधिक जुड़े रहते हैं, तो सफलता हमें अहंकारी और असफलता हमें निराश कर देती है। यह एक ऐसा बंधन है जो हमें वर्तमान में जीने से रोकता है और हमारी ऊर्जा को व्यर्थ की चिंताओं में खर्च करता है। यह डर और भ्रम से मुक्ति पाने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। गीता अध्याय 2 मनोविज्ञान इस बात पर जोर देता है कि फल की आसक्ति ही तनाव का मूल कारण है।
समत्व बुद्धि का अर्थ है सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, जय-पराजय—इन द्वंद्वों में समान भाव रखना। यह केवल उदासीनता नहीं है, बल्कि एक गहरी आंतरिक स्थिरता है।
श्लोक 2.50: "बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥"
अर्थ: समत्व बुद्धि से युक्त व्यक्ति इस लोक में पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। अतः तुम योग में लग जाओ, योग ही कर्मों में कुशलता है।
समत्व बुद्धि हमें जीवन की हर परिस्थिति में शांत और संतुलित रहने में मदद करती है। यह हमें प्रतिक्रिया देने की बजाय समझदारी से कार्य करने की क्षमता प्रदान करती है। यह मन पर नियंत्रण गीता के सिद्धांतों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बुद्धियोग का अर्थ है बुद्धि का योग, अर्थात अपनी बुद्धि को परमात्मा से जोड़ना, विवेक का प्रयोग करना। कर्मयोग का अर्थ है फल की आसक्ति के बिना कर्म करना। भगवद गीता अध्याय 2 में इन दोनों का गहरा संबंध बताया गया है। बुद्धियोग हमें यह समझने में मदद करता है कि हमें कौन से कर्म करने चाहिए और क्यों, जबकि कर्मयोग हमें उन कर्मों को सही ढंग से, बिना आसक्ति के करने की शक्ति देता है। ये दोनों मिलकर एक पूर्ण आध्यात्मिक मार्ग बनाते हैं, जो आध्यात्मिक ज्ञान हमारे जीवन को प्रकाशित करता है।
श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि इंद्रियों के विषयों में आसक्ति कैसे व्यक्ति के पतन का कारण बनती है।
श्लोक 2.62-63: "ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥"
अर्थ: विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना की पूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से सम्मोह (मूढ़ता) उत्पन्न होता है, सम्मोह से स्मृति का नाश होता है, स्मृति के नाश से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से मनुष्य का पतन हो जाता है।
यह पतन की एक स्पष्ट मनोवैज्ञानिक श्रृंखला है जो हमें सिखाती है कि मन पर नियंत्रण गीता के सिद्धांतों का पालन करना क्यों महत्वपूर्ण है। यदि हम अपनी इंद्रियों को अनियंत्रित छोड़ दें, तो वे हमें विनाश की ओर ले जा सकती हैं। यह गीता अध्याय 2 मनोविज्ञान का एक गहरा विश्लेषण है।
'स्थितप्रज्ञ' वह व्यक्ति है जिसकी बुद्धि स्थिर हो गई है, जो सुख-दुःख में समान रहता है और जिसकी इंद्रियाँ उसके वश में होती हैं। श्रीकृष्ण ने स्थितप्रज्ञ के लक्षण विस्तार से बताए हैं:
श्लोक 2.55: "प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥"
अर्थ: जब मनुष्य मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण रूप से त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।
श्लोक 2.56: "दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥"
अर्थ: जिसके मन में दुःखों के प्रति उद्वेग नहीं है, जो सुखों की इच्छा से रहित है, और जो राग, भय तथा क्रोध से मुक्त है, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहलाता है।
श्लोक 2.57: "यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥"
अर्थ: जो सभी जगह स्नेह रहित है, और जो शुभ या अशुभ वस्तु को पाकर न तो प्रसन्न होता है और न घृणा करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।
यह स्थितप्रज्ञ कौन है—यह जानना और इस अवस्था को प्राप्त करने का प्रयास करना ही आध्यात्मिक साधकों का लक्ष्य होता है। यह मानसिक स्थिरता और आत्मसंयम की अवस्था है, जो तनाव से मुक्ति गीता के मार्ग पर चलने से प्राप्त होती है।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की सबसे बड़ी पहचान उसकी मानसिक स्थिरता और आत्मसंयम है। वह जानता है कि बाहरी परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, लेकिन उसकी आंतरिक शांति अक्षुण्ण रहती है। वह सुख-दुःख, लाभ-हानि में समान दृष्टि रखता है, क्योंकि वह आत्मा की अमरता और कर्म के सिद्धांत को गहराई से समझता है। यह समत्व बुद्धि का व्यवहारिक रूप है। एक शांत मन के लिए ध्यान बहुत महत्वपूर्ण है; कम एकाग्रता अवधि वाले लोगों के लिए ध्यान कैसे करें पर एक मार्गदर्शिका है।
2026 में भी, भगवद गीता अध्याय 2 उतना ही प्रासंगिक है, जितना हजारों वर्ष पहले था। आधुनिक जीवन में तनाव, चिंता, निर्णय-क्षमता की कमी और भय आम समस्याएँ हैं।
निर्णय-क्षमता: अर्जुन की दुविधा हमें सिखाती है कि कैसे मोह और अज्ञान हमारी निर्णय-क्षमता को प्रभावित करते हैं। आत्मा की अमरता और कर्तव्यनिष्ठा का ज्ञान हमें स्पष्ट और सही निर्णय लेने में मदद करता है।
तनाव और भय से मुक्ति: फलासक्ति छोड़ना और समत्व बुद्धि अपनाना हमें तनाव से मुक्ति गीता के मार्ग पर ले जाता है। जब हम परिणाम की चिंता छोड़ देते हैं, तो हम अधिक रचनात्मक और कुशल बन जाते हैं। मृत्यु का भय आत्मा की अमरता को जानकर दूर हो जाता है।
रिश्तों में सामंजस्य: यह समझना कि हर व्यक्ति केवल एक आत्मा है जो शरीर धारण किए हुए है, हमें रिश्तों में अधिक धैर्यवान और दयालु बनाता है, क्योंकि हम बाहरी पहचानों से परे देखते हैं।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि जीवन की चुनौतियों का सामना कैसे करें, बिना अपनी आंतरिक शांति खोए। यह गीता से जीवन मार्गदर्शन का एक शक्तिशाली स्रोत है।
भगवद गीता अध्याय 2 को 'बीज-अध्याय' या 'संक्षिप्त गीता' कहा जाता है क्योंकि इसमें पूरी गीता के सभी मुख्य सिद्धांतों का सार प्रस्तुत किया गया है।
आत्मा-परमात्मा का ज्ञान (सांख्य योग): आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता का गहन दर्शन यहीं से शुरू होता है।
कर्म का सिद्धांत (कर्मयोग): निष्काम कर्म का मूल मंत्र इसी अध्याय में दिया गया है, जो आगे के अध्यायों में विस्तार पाता है।
भक्ति का बीज: अर्जुन की शरणागति और श्रीकृष्ण के प्रति उनका विश्वास भक्ति योग का आधार है।
ज्ञान का आधार: स्थितप्रज्ञ की परिभाषा और इंद्रिय-निग्रह का महत्व ज्ञान योग की नींव रखता है।
यह अध्याय एक नींव की तरह है जिस पर संपूर्ण भगवद गीता का भव्य महल खड़ा है। इसे समझने के बाद, आगे के अध्याय को समझना आसान हो जाता है। यह गीता अध्याय 2 सरल व्याख्या हमें समग्र ज्ञान की ओर ले जाती है।
भगवद गीता अध्याय 2 (सांख्य योग) हमें जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पाठ सिखाता है: आत्मज्ञान और कर्म का संतुलन। यह हमें बताता है कि जीवन केवल भौतिक अनुभवों का एक सिलसिला नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा है जहाँ हमें अपनी वास्तविक पहचान—अमर आत्मा—को समझना है और अपने कर्तव्यों का पालन बिना आसक्ति के करना है।
इस अध्याय के सिद्धांतों को अपने जीवन में लागू करके, आप अर्जुन की तरह ही अपने डर और भ्रम से मुक्ति पा सकते हैं। आप अपनी निर्णय-क्षमता में सुधार कर सकते हैं, तनाव से मुक्ति पा सकते हैं, और जीवन के हर पहलू में मानसिक स्थिरता और आत्मसंयम विकसित कर सकते हैं। यह केवल एक प्राचीन पाठ नहीं, बल्कि 2026 में भी आपके लिए एक व्यावहारिक मार्गदर्शक है जो आपको एक अधिक पूर्ण, शांतिपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने में मदद करेगा। तो, आइए इन शाश्वत सिद्धांतों को आत्मसात करें और अपने जीवन को भगवद गीता के दिव्य ज्ञान से आलोकित करें।
कार्यवाही योग्य अगले कदम:
प्रतिदिन चिंतन करें: भगवद गीता अध्याय 2 के प्रमुख श्लोकों पर प्रतिदिन कुछ मिनट चिंतन करें। विशेष रूप से श्लोक 2.20, 2.27, 2.47 और 2.56 पर।
निष्काम कर्म का अभ्यास करें: अपने दैनिक कार्यों को परिणाम की चिंता किए बिना, पूरी लगन और ईमानदारी से करने का प्रयास करें। देखें कि यह आपके तनाव के स्तर को कैसे प्रभावित करता है।
समत्व बुद्धि का विकास करें: छोटी-छोटी असफलताओं या सफलताओं पर समान भाव रखने का अभ्यास करें। यह आपकी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को संतुलित करने में मदद करेगा।
इंद्रिय निग्रह का प्रयास करें: अपनी इंद्रियों को बाहरी विषयों में भटकने से रोकने के छोटे-छोटे प्रयास करें। यह मन पर नियंत्रण गीता के सिद्धांतों की ओर पहला कदम है।
आगे पढ़ें: भगवद गीता के अन्य अध्यायों का अध्ययन जारी रखें, क्योंकि प्रत्येक अध्याय इस मूल ज्ञान का विस्तार करता है। आप भक्ति योग या शरणगति जैसे विषयों पर भी आगे पढ़ सकते हैं।