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    धर्म का वास्तविक स्वरूप: भौतिक इच्छाओं की पूर्ति या आत्म-साक्षात्कार?

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    Ak Mishra
    ·January 11, 2026
    ·5 min read

    आज के आधुनिक युग में 'धर्म' शब्द की परिभाषा अत्यंत संकुचित हो गई है। अधिकांश लोग धर्म को केवल कर्मकांडों, व्रतों और अपनी भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति के साधन के रूप में देखते हैं। लेकिन क्या धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल धन, संपत्ति, अच्छा स्वास्थ्य या सांसारिक सफलता प्राप्त करना है? हमारे प्राचीन शास्त्रों, विशेषकर श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवतम के अनुसार, धर्म का अर्थ इससे कहीं अधिक गहरा और आध्यात्मिक है। इस लेख में हम धर्म के विभिन्न स्तरों, गुणों के प्रभाव और जीवन के वास्तविक लक्ष्य पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

    त्रिगुण और उपासना पद्धति

    प्रकृति के तीन गुण—सत्व, रज और तम—मनुष्य की चेतना और उसकी उपासना पद्धति को निर्धारित करते हैं।

    1. तमोगुणी उपासना: जो लोग तमोगुण से प्रभावित होते हैं, वे अक्सर काल भैरव, भैरवी या काली जैसे उग्र रूपों की उपासना करते हैं। उनकी भक्ति का आधार अक्सर भय या किसी विशिष्ट भौतिक शक्ति की प्राप्ति होता है।

    2. रजोगुणी उपासना: रजोगुणी व्यक्ति अपनी महत्वाकांक्षाओं और ऐश्वर्य की पूर्ति के लिए इंद्र, सूर्य, चंद्रमा और अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य समाज में नाम, यश और भौतिक सुख-सुविधाएं प्राप्त करना होता है।

    3. सत्वगुणी उपासना: सत्वगुण में स्थित व्यक्ति विवेकशील होता है। वह शास्त्रों के आदेशों और ऋषियों के वचनों पर विश्वास करता है। ऐसे लोग सीधे नारायण (भगवान विष्णु) की आराधना करते हैं। उनकी श्रद्धा शास्त्रों पर आधारित होती है, जिससे उनका हृदय शुद्ध होता है और वे आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।

    धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष: एक गलतफहमी

    हिंदू धर्म में पुरुषार्थ चतुष्टय (चार लक्ष्य) का वर्णन है: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। वर्तमान में समाज में एक बड़ी गलतफहमी यह है कि लोग धर्म का पालन केवल 'अर्थ' (धन) और 'काम' (इच्छाओं की पूर्ति) के लिए करते हैं।


    उदाहरण के लिए, दिवाली पर लक्ष्मी, गणेश और सरस्वती जी की पूजा अक्सर धन, बाधा मुक्ति और बुद्धि के लिए की जाती है। लोग भगवान के साथ एक प्रकार की 'बिजनेस डीलिंग' करते हैं—"हे भगवान, अगर मेरा यह काम हो गया, तो मैं इतने का प्रसाद चढ़ाऊंगा।" यह धर्म का निम्नतम स्तर है।


    शास्त्रों के अनुसार, धर्म का उद्देश्य अर्थ (पुण्य कर्म) होना चाहिए, और अर्थ का उपयोग केवल जीवन निर्वाह के लिए होना चाहिए, न कि इंद्रिय तृप्ति के लिए। जब व्यक्ति भौतिक सुखों से थक जाता है, तब वह मोक्ष की कामना करता है। लेकिन वास्तविक धर्म वह है जो हमें वृद्धावस्था का इंतजार किए बिना, जीवन के प्रारंभ से ही आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाए।

    वेदों का 'पुष्पित' ज्ञान और गीता का संदेश

    श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण वेदों की 'पुष्पित वाणी' (Flowery Language) के बारे में बताते हैं। वेदों के कर्मकांड अनुभाग में सुंदरता, अच्छे जीवनसाथी और धन प्राप्ति के लिए अनेक विधियां दी गई हैं। ये बातें सुनने में बहुत प्रिय लगती हैं, जैसे फूलों की सुगंध। लेकिन कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि इन तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) से ऊपर उठो और सत्य को देखो। सत्य 'आत्मा' और 'परमात्मा' है।

    धर्म परिवर्तन और भौतिक मानसिकता

    आजकल धर्म परिवर्तन की समस्या भी इसी भौतिक मानसिकता के कारण बढ़ रही है। जब लोग धर्म को केवल भौतिक लाभ का जरिया मानते हैं, तो वे आसानी से भ्रमित हो जाते हैं। अन्य धर्मों के प्रचारक अक्सर गरीब या भोले-भाले लोगों को यह कहकर बहलाते हैं कि "तुम्हारे भगवान ने तुम्हें घर या नौकरी नहीं दी, हमारे पास आओ, हम तुम्हें अच्छी शिक्षा और पैसा देंगे।" चूंकि व्यक्ति की श्रद्धा केवल भौतिक सुविधाओं पर टिकी होती है, इसलिए वह अपना धर्म बदल लेता है। वास्तविकता यह है कि कोई भी व्यक्ति किसी का भक्त नहीं है, बल्कि वह अपनी 'इंद्रिय तृप्ति' (Sense Gratification) का भक्त है।

    श्रीमद्भागवतम: एक निर्मल पुराण

    श्रीमद्भागवतम को 'अमल पुराण' (Spotless Puran) कहा गया है क्योंकि इसमें से 'कैतव धर्म' यानी कपटपूर्ण धर्म को निकाल दिया गया है। कपटपूर्ण धर्म वह है जहाँ धर्म के नाम पर भौतिक लाभ की इच्छा की जाती है। भागवतम सीधे आत्मा का परमात्मा से संबंध स्थापित करता है। यह हमें वेदों के कर्मकांड रूपी जंगल में फंसाने के बजाय सीधे आध्यात्मिक मुक्ति के राजमार्ग पर ले जाता है।

    जीवन का वास्तविक स्वार्थ: विष्णु

    प्रह्लाद महाराज श्रीमद्भागवतम में कहते हैं— "न ते विदुः स्वार्थगतिं हि विष्णुं"। अर्थात, जीव अपना वास्तविक स्वार्थ नहीं जानता। हमारा वास्तविक स्वार्थ भगवान विष्णु की सेवा है। जैसे आग की एक चिंगारी जब तक आग के साथ है, तब तक वह प्रज्वलित रहती है, लेकिन बाहर गिरते ही बुझ जाती है। उसी प्रकार, हम भगवान के अंश हैं। जब तक हम उनसे अलग होकर भौतिक जगत में सुख ढूंढेंगे, हम कभी संतुष्ट नहीं होंगे। चाहे कोई अरबपति हो या गरीब, हर किसी के जीवन में कोई न कोई कमी बनी रहती है क्योंकि शरीर सीमित है और आत्मा अनंत आनंद चाहती है।

    कलियुग में धर्म का सर्वोच्च सिद्धांत: हरे कृष्ण महामंत्र

    इस युग में आत्म-साक्षात्कार का सबसे सरल और शक्तिशाली मार्ग 'हरे कृष्ण महामंत्र' का जप है:
    "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"

    यह मंत्र दो कार्य करता है:
    1. आत्मा की शुद्धि: यह हृदय के दर्पण पर जमी भौतिक इच्छाओं की धूल को साफ करता है।
    2. भगवत संबंध: यह भगवान के साथ हमारे शाश्वत संबंध को फिर से जागृत करता है।

    निष्कर्ष

    धर्म कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सके। माता-पिता, पत्नी या समाज के प्रति हमारे कर्तव्य 'नैमित्तिक' (परिस्थितिजन्य) हैं, लेकिन भगवान के प्रति हमारा कर्तव्य 'शाश्वत' है। वास्तविक धर्म वह है जो हमें यह बोध कराए कि "मैं यह शरीर नहीं, बल्कि एक शुद्ध आत्मा हूँ।"

    यदि हम केवल शरीर की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धर्म का उपयोग कर रहे हैं, तो हम केवल एक 'अपार्टमेंट' (शरीर) से दूसरे अपार्टमेंट में भटकते रहेंगे। मृत्यु के समय यह शरीर और इससे जुड़ी सभी उपलब्धियां यहीं रह जाएंगी। इसलिए, बुद्धिमान व्यक्ति वही है जो जीवन रहते ही प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन में भक्ति योग का अभ्यास करे और अपने वास्तविक घर (वैकुंठ) लौटने की तैयारी करे।

    याद रखें, धर्म का अर्थ 'सेवा' है। हम किसी न किसी की सेवा कर ही रहे हैं, लेकिन जब यह सेवा स्वार्थ से ऊपर उठकर निस्वार्थ भाव से भगवान कृष्ण के लिए की जाती है, तभी जीवन सफल होता है।